लखनऊ: क्या केवल शिक्षित होने या कमाने की क्षमता रखने भर से पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं रहती? इस अहम सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए साफ किया है कि पत्नी के पढ़े-लिखे होने या नौकरी करने की क्षमता भर से उसे सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता मांगने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि असली सवाल यह है कि क्या पत्नी के पास वर्तमान समय में खुद का भरण-पोषण करने की वास्तविक और पर्याप्त क्षमता मौजूद है। साथ ही वह अपने वैवाहिक जीवन के दौरान मिले जीवन-स्तर के अनुरूप जीवन यापन कर सकती है या नहीं, इसका भी आकलन जरूरी है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो जाए कि पत्नी किसी लाभकारी रोजगार में है और अपने खर्चों के लिए पर्याप्त आय अर्जित कर रही है, तब तक पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।
पति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर तय होगा भरण-पोषण
हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण के अधिकार का निर्धारण पति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। केवल पत्नी की शैक्षणिक योग्यता या उसकी पूर्व नौकरी को आधार बनाकर गुजारा भत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता।
दरअसल, पत्नी ने आगरा फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे 15 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। महिला ने इस राशि को अपर्याप्त बताते हुए बढ़ाने की मांग की थी।
2014 में हुई थी शादी, पत्नी ने लगाए दहेज उत्पीड़न के आरोप
मामले में दोनों पक्षों की शादी अगस्त 2014 में हुई थी। पत्नी का आरोप है कि विवाह के महज एक महीने बाद ही दहेज की अवैध मांगों को लेकर उसे घर से निकाल दिया गया। महिला ने कहा कि पति ने बिना किसी उचित कारण के उसे छोड़ दिया और करीब 5 करोड़ रुपये की सालाना आय होने के बावजूद उसे कोई आर्थिक सहायता नहीं दी।
वहीं पति ने अदालत में दावा किया कि पत्नी ने खुद उसे बिना पर्याप्त कारण छोड़ दिया और उसके साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया।
पति बोला- पत्नी MBA है, 50 हजार से ज्यादा कमा सकती है
हाईकोर्ट में पति की ओर से दलील दी गई कि पत्नी अत्यधिक शिक्षित है और उसके पास एमबीए की डिग्री है। शादी से पहले वह अच्छी नौकरी कर रही थी और प्रति माह 50 हजार रुपये से अधिक कमाने की क्षमता रखती है।
पति ने यह भी कहा कि उसकी खुद की मासिक आय केवल 15 से 20 हजार रुपये के बीच है और उसे अपनी वृद्ध मां की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देकर हाईकोर्ट ने कही अहम बात
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित ‘चतुर्भुज बनाम सीता बाई, 2007’ मामले का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि “खुद का गुजारा करने में असमर्थ” का अर्थ यह नहीं है कि पत्नी पूरी तरह बेसहारा या दर-दर की मोहताज हो।
अदालत ने कहा कि पत्नी में कमाने की क्षमता होने के बावजूद पति का भरण-पोषण का दायित्व खत्म नहीं होता।
पति की आय को लेकर कोर्ट ने जताया संदेह
हाईकोर्ट ने पति की ओर से बताई गई आय को संदिग्ध माना। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि पति आलीशान जीवनशैली जी रहा है, जबकि वह अपनी वास्तविक आमदनी बताने से बचता नजर आया।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि आय के संबंध में पति का टालमटोल रवैया उसकी वास्तविक कमाई पर गंभीर संदेह पैदा करता है।
दोनों पक्षों की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि 15 हजार रुपये प्रतिमाह का भरण-पोषण न तो न्यायसंगत है और न ही पर्याप्त। इसके बाद अदालत ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए मामले को दोबारा भरण-पोषण राशि तय करने के लिए परिवार न्यायालय भेज दिया।
